दिगम्बर तीर्थक्षेत्र मांगी तुंगी गिरि

वस्तुत: मांगी तुंगी गिरि पर अनेकों दिगम्बर जैन प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं तथा अनेक इतिहासों को अपने गर्भ में संजोए ‘‘मांगीतुंगी’’ सिद्ध क्षेत्र प्राचीन काल से एक तपस्वी की भांति अडिग और निष्काम रूप से खड़ा अपनी पावनता का संदेश दे रहा है, जहाँ भक्तगण श्रद्धा पूर्वक जाकर वंदना करते हैं तथा अपने असंख्य कर्मों की निर्जरा करते हैं ।

बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री १०८ शांति सागर जी महाराज की अक्षुण्ण परम्परा के पंचम पट्टाधीश स्व० आचार्य श्री १०८ श्रेयांस सागर महाराज की प्रेरणा से सन् १९८७ से इस तीर्थ के विकास का कार्य एवं जीर्णोद्धार प्रारंभ हुआ । पर्वत की तलहटी में दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र तीर्थ है, जिसमें दिगम्बर जैन परम्परा के अति प्राचीन ५ मंदिर हैं -

१. श्री सातिशय विश्व हितंकर चिन्तामणि पार्श्वनाथ जिन मंदिर
२. श्री १००८ मूलनायक आदिनाथ भगवान जिन मंदिर
३. संकटमोचन श्री पार्श्वनाथ भगवान जिन मंदिर
४. मूलनायक मुनि सुव्रत नाथ भगवान व २४ खड्गासन तीर्थंकर जिन मंदिर
५. सहस्रकूट कमल मंदिर (गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी की प्रेरणा से निर्मित) साथ ही एक मान स्तंभ है ।

भगवान पार्श्वनाथ मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा का अतिशय चमत्कारिक है , जहाँ भक्तगण अपने मनोरथ सिद्ध करते हैं ।
पूज्य स्व. आचार्य श्री श्रेयांस सागर महाराज की पावन प्रेरणा से यहाँ वर्तमान चौबीसी मंदिर, मान स्तंभ तथा सहस्रकूट जिन प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। आचार्य श्री अपने संघ सहित जहाँ भी विहार करते थे , इस सिद्ध भूमि के विकास हेतु श्रावकों को मांगी तुंगी सिद्ध क्षेत्र की यात्रा एवं वहाँ सहयोग देने की प्रेरणा प्रदान करते थे ।

चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परम्परा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री १०८ अजित सागर महाराज की समाधि के पश्चात् १० जून १९९० को लोहारिया (राज.) की विशाल जनसभा में चतुर्विध संघ द्वारा श्री श्रेयांस सागर जी महाराज को पंचम पट्टाचार्य पदवी से अलंकृत किया गया था पुन: सन् १९९२ में उन्होंने अपने संघ सहित राजस्थान से श्रवण बेलगोला की ओर विहार किया ,

तब मार्ग में मांगी तुंगी सिद्ध क्षेत्र के पंचकल्याणक की भावना उनके मन में थी किन्तु १९ फरवरी १९९२ फाल्गुन कृष्ण एकम्को खांदू कालोनी में अचानक दो दिन की बीमारी से उनका समाधिमरण हो गया पुन: उनकी संघ स्थशिष्या पूज्य आर्यिका श्री श्रेयांसमती माता जी ने गुरु के अपूर्ण कार्य को पूर्ण करने का संकल्प लिया और अपना काफी समय इस विकास हेतु क्षेत्र के लिए समर्पित किया।

महाराज श्री की समाधि के पश्चात आर्यिका श्री श्रेयांसमती माता जी एवं वहाँ के ट्रस्टी गण चाहते थे कि इस प्राचीन आचार्य परम्परा की सर्व वरिष्ठ दीक्षित साध्वी ,दिव्य शक्ति परम पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के पावन निर्देशन एवं सानिध्य में ही यहाँ का पंचकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हो, इस हेतु उन लोगों ने अपने प्रबल प्रयास प्रारंभ कर दिये थे किन्तु अत्यधिक दूरी एवं स्वास्थ्य की प्रतिकूलता उसमें बाधा उत्पन्न कर रही थी।

किन्तु आर्यिका श्री श्रेयांसमती माता जी एवं ट्रस्टियों की ओर से पूज्य माता जी को पुन:-पुन: निवेदन चलता रहा कि पूज्य माता जी ! आप जैसी दिव्य शक्ति के आने पर ही यहाँ का रुका कार्य पूर्ण हो सकता है अत: आप एक बार मांगी तुंगी अवश्य पधार कर अनेक वर्षों से रुके पंचकल्याणक को सम्पन्न करा दीजिए।

परिणाम स्वरूप एक दिन २५ नवम्बर १९९५ को पूज्य माता जी के भाव बन गए और वे कहने लगीं कि मुझे मांगी तुंगी के लिए विहार करना है।देखते ही देखते २७ नवम्बर १९९५ को हस्तिनापुर से माता जी का संघ सहित मांगी तुंगी के लिए विहार हो गया , फिरतोपूज्यमाताजीकेप्रवेशकेसाथहीवहाँयात्रियोंकातांतालगगया।


यह सिद्ध क्षेत्र के चमत्कार का ही प्रतिफल रहा है कि १९ मई १९९६ से २३ मई १९९६ तक वहाँ होने वाली पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में तीन-तीन संघों का (आचार्य श्री रयणसागर महाराज,गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी एवं आर्यिका श्री श्रेयांसमती माता जी का) सानिध्य प्राप्त हुआ।

इतिहास बताता है कि वि.सं. १९९७ में यहाँ मान स्तंभ की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के समय आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं आचार्य कल्प मुनि श्री वीर सागर जी महाराज का संघ सहित पदार्पण हुआ था। उसके पश्चात दीर्घकालीन अवधि के बाद इस तीर्थ पर त्रय संघ सानिध्य में पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ

भगवान मुनि सुव्रत नाथ तीर्थंकर के काल में श्री राम, हनुमान आदि ९९ करोड़ मुनिराज सिद्ध हुए थे, इसलिए आचार्य श्री श्रेयांस सागर महाराज की प्रेरणा से २१ फीट उत्तुंग काले पाषाण की भगवान मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा एवं ६-६ फीट की अन्य २४ प्रतिमाएँ विराजमान की गईं ।

वहाँ विराजित आर्यिका संघ के, क्षेत्र के ट्रस्टियों एवं महाराष्ट्र प्रान्तीय भक्तों के विशेष आग्रह पर पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी का संघ सहित १९९६ का चातुर्मास मांगी तुंगी सिद्ध क्षेत्र पर ही हुआ, इस चातुर्मास में अनेक उपलब्धियों के साथ एक विशेष उपलब्धि हुई, जो विश्व का आश्चर्य बनकर प्रगट हो रही है।

पर्वत की अखण्ड शिला में प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभ देव की १०८ फुट विशालकाय मूर्ति निर्माण की पूज्य माता जी ने शरद पूर्णिमा - १९९६ को इस मूर्ति के निर्माण की घोषणा की , जिसका पूरे देशवासियों ने स्वागत करते हुए अपना तन -मन -धन न्योछावर करने का संकल्प किया और इसी के साथ मूर्ति निर्माण योजना जोर - शोर से शुरू हो गई।

मूर्ति निर्माण कमेटी का गठन होकर उसकी अध्यक्षता का भार कर्मयोगी ब्र० रवीन्द्र कुमार जी (वर्तमान रवीन्द्र कीर्ति स्वामी जी ) के कन्धों पर डाला गया ,महामंत्री डा० पन्ना लाल जैन पापडी वाल को बनाया गया।

समिति में अनेकानेक कर्मठ कार्यकर्ताओं के सहयोग से सर्व प्रथम पहाड पर निर्माण हेतु सरकार से स्वीकृति लेने के लिए सरकारी कार्यवाही पूर्ण करके, मूर्ति निर्माण हेतु नई कमेटी गठित करके ३ मार्च २००२ को पर्वत पर शिला पूजन समारोह भव्यता पूर्वक सम्पन्न हुआ।

मूर्ति निर्माण का कार्य योजनाबद्ध तरीके से चला।

यात्रियों की सुविधा के लिए भोजनशाला एवं आवास हेतु अनेक धर्मशालाएँ हैं तथा पानी – बिजली आदि की पूर्ण सुविधा है।यहाँ पर प्रतिवर्ष कार्तिक सुदी पूर्णिमा के दिन भव्य मेला लगता है। इस मेले में हजारों जैन, हिंदू आदि बंधु एकत्रित होते हैं।