प्रवचन

मुनि प्रणम्य सागर ने कहा कि ध्यान लगाने के लिए हमारा शरीर , स्थान , काल और हमारे भाव आवश्यक हैं। यह चार प्रकार की भावना से ही संभव है । हमें ध्यान से पूर्व अपने आप को निर्मल व्  शुभ बनाना जरुरी है । सभी जीवों से मैत्री भाव , गुणों से प्रीति , दया का भाव रखना व् मध्यस्थ भाव में रहने से हम धर्म ध्यान कर सकते हैं । शुद्ध आत्मा में रमण करना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।