।।श्री मुनि सुव्रत नाथ चालीसा।।

।।श्री मुनि सुव्रत नाथ चालीसा।।

वंदन कर अरिहन्त को सिद्धन करूं प्रणाम।
सुरि पाठक साधु के चरण कमल सुख धाम।

तीर्थंकर जिन देव की जिनवाणी अनुसार।
मुनिसुव्रत तीर्थेश के , गुणगाऊँ चित धार।

मुनिसुव्रत भगवान हमारे, वीत राग जिन जग से न्यारे।
दोष अठारह नाशन हारे,गुण अनन्त के धारण हारे।

आप अनन्त ज्ञान के स्वामी, सर्व जगत के अन्तर्यामी।
आप अनंत बलों को धारें , सुख अनंत को नित्य संभारे।

नील वर्ण की देह तुम्हारी ,जग जन मन को लगती प्यारी।
सुरभित देह निरन्तर सोहे ,भक्तों के मन को अति मोहे।

शुक्ल रक्तमय देह धरे हो ,सबके प्रति करुणा धारे हो।
आप चरण का ध्यान करे जो ,काम क्रोध सब आप हरे हो।

जहाँ आपका समवसरण हो ,वहाँ रोग चिन्ता भय ना हो।
आप बीसवें हो तीर्थंकर ,नित प्रति वंदन करते गणधर।

सुरगण चक्री महिमा गावें ,तुम गण गण का पार न पावें।
माँ सोमा के गर्भ में आए ,नृप सुमित्र का मन हर्षाये।

गर्भ समय कल्याणक कीने ,देवों ने जन मन हर लीने।
जन्म समय मेरु पर्वत पे ,सुर विद्या धर हर्षे मन में।

पुर कुशाग्र में जन्म लिये हो , हरिवंश के तिलक हुए हो।
चैत्र कृष्ण दशमी तिथी जन्मे ,बीस धनुष का तन यह चमके।

तीस हज़ार वर्ष की आयु ,राजगृही में दीक्षा पायी।
पूर्व भवों का सुमरण आया ,बेला कर तप में चितलाया।

एक हज़ार नृपति संग दीक्षा ,राजगृही में पारण इच्छा।
नौवीं कृष्ण मास बैसाख , उपज्यो केवल ज्ञान प्रकाश।

ढाई योजन का विस्तारा ,समवशरण शोभे अति प्यारा।
मल्लीगणधर नाम प्रमुख है , अट्ठारह गणधर संमुख हैं।

फागुण कृष्णा बारस के दिन ,मोक्ष लिया तब हुए करम बिन।
शिखर सम्मेद जगत विख्यात ,निर्जर कूट सदा मन लात।

अष्ट कर्म दल चूर किया है ,सुख अनंत का भोग किया है।
विश्व चराचर के ज्ञाता हो ,दृष्टा तथा महा साता हो।

आप नाम का सुमरण भगवन ,बाधाएँ हर लेता हर क्षण।
जो जन करे आपकी पूजा , नहीं मिले उसको भव दूजा।

आप प्रभाव कहे को ज्ञानी , कह ना सकी सुर गुरु की वाणी।
जो सामर्थ्य आप में देखी ,नहीं कुदेवों में वह देखी।

राम लखन हनुमान महान ,सभी तीर्थ तव सेवे जान।
लाख वर्ष छह काल विशाल ,धर्म तीर्थ से हुए निहाल।

जो भी करें आपकी भक्ति ,उसको मिलती आतम शक्ति।
आप चरण कमलों की अर्चा , दुःख हरती देती सुख चर्चा।

सभी अमंगल निष्ट टले हैं ,चालीसा जो नित्य पढ़े हैं।

मुनि सुव्रत भगवान का चालीसा सुखकार।
पढ़े नित्य चालीस दिन हो 'प्रणम्य' अविकार।