।। गुरु भक्ति ।।

।। गुरु भक्ति ।।

मैं परम दिगम्बर साधु के गुण गाऊँ रे ,
मैं पंच महाव्रतधारी को शीश नावउँ रे।

जो बीस आठ गुण धरते , मन वचन काय वश करते ,
बाईस परि षहजयी जितेन्द्रिय ध्याऊँ रे ।।

मैं परम दिगम्बर साधु के गुण गाऊँ रे ,
मैं पंच महाव्रतधारी को शीश नावउँ रे।

जिन कनक कामिनी त्यागी ,मन ममता मार विरागी ,
हो स्व पर भेद विज्ञानी के गुण पाऊँ रे ।

मैं परम दिगम्बर साधु के गुण गाऊँ रे ,
मैं पंच महाव्रतधारी को शीश नावउँ रे।