।। सरस्वती माता अर्घ ।।

।। सरस्वती माता अर्घ ।।

जल चंदन अक्षत फूल चरु , अरु दीप धूप अति फल लावै।
पूजा को ठानत जो तुम जानत , सो नर ध्यानत सुख पावै।

तीर्थंकर की ध्वनि , गणधर ने सुनि , अंग रचे चुनि ज्ञानमई ।
सो जिनवर वानी , शिव सुख दानी , त्रिभुवन-मानी पूज्य भई ।

।। ओं ह्रीं श्री जिन- मुखोदभव - सरस्वती देव्यै अर्घं निर्वपामिति स्वाहा ।।