।। सप्तर्षि ।।

।। सप्तर्षि ।।

जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर , दीप धूप सु लावना ,
फल ललित आठों द्रव्य - मिश्रित , अर्घ कीजे पावना ।
मन्वादि चारण- ऋद्धि - धारक, मुनिन की पूजा करूं ,
ता करें पातक हरें सारे , सकल आनंद विस्तरुं ।

।। ओ ह्रीं श्री श्रीमनवादी सप्तऋषिभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।