।। ।। रत्नत्रय अर्घ ।।

।। रत्नत्रय अर्घ ।।

आठ दरब निरधार , उत्तम सों उत्तम लिये ।
जनम- रोग निरवार , सम्यक रत्न-त्रय भंजू ।।

।। ओं ह्री सम्यक रत्नत्रयाय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घं निर्वपामिति स्वाहा ।।