श्री आदिनाथ - जिनेंद्र

श्री आदिनाथ - जिनेंद्र

शुचि निर्मल - नीरं गंध सुअक्षत , पुष्प चरु ले मन - हरषाय।
दीप धूप फल अर्घ सु लेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय।

श्री आदिनाथ के चरण -कमल पर , बलि - बलि जाऊँ मन - वच -काय।
हो करुणानिधि भव -दुःख मेटो।, यातैं मैं पूजौं प्रभु -पाय।

।।ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद - प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।।